- बिहार के एक स्कूल में मिड-डे मील योजना के तहतपरोसा गया विषाक्त भोजन खाने से 23 बच्चे असमय कालके गाल में समा गये और कई अब भी जिंदगी की लड़ाईलड़ रहे हैं. देश भर में मिड-डे मील में लापरवाही की घटनाएंपहले भी सामने आती रही हैं, लेकिन ऐसी लापरवाही कोरोकने के पुख्ता इंतजाम नहीं हो पाने के कारण बच्चों कोकुपोषण से बचानेवाली यह पूरी योजना संदेह के घेरे में आगयी है. क्या है यह मिड-डे मील योजना, कब और क्यों हुईइसकी शुरुआत? इन सब पहलुओं पर नजर डाल रहा हैआज का नॉलेज.. -
* मिड-डे मील का इतिहास
मिड-डे मील स्कीम देशभर के प्राथमिक स्कूलों में चलायी जानीवाली एक लोकप्रिय योजना है. इसके तहत स्कूल मेंकार्य दिनों के दौरान बच्चों को मुफ्त भोजन दिया जाता है. इसका मुख्य मकसद बच्चों को पोषणयुक्त भोजनमुहैया कराना है. औपचारिक तौर पर भले ही इसकी शुरुआत 1995 से मानी जाती हो, लेकिन इसका इतिहासबहुत पुराना रहा है. खासकर तमिलनाडु में तो प्राचीन मद्रास शहर में निगम स्कूलों में 1923 में ही बच्चों कोभोजन दिये जाने की शुरुआत की गयी थी. 1960 में तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री के कामराज ने कईस्कूलों में इसे शुरू किया, जिसे 1982 में एमजी रामचंद्रन की सरकार ने आगे बढ़ाया. उन्होंने 10वीं कक्षा तक केबच्चों को इसके दायरे में लाने का फैसला लिया.
* कई राज्यों ने अपनाया
तमिलनाडु में इसकी सफलता के बाद कई अन्य राज्यों ने भी इस कार्यक्रम की शुरुआत की. 1980 के दशक केआखिर तक आंध्र प्रदेश और गुजरात ने इसको शुरू कर दिया था. 1995 तक केरल समेत मध्य प्रदेश औरओड़िशा की सरकारों ने कुछ इलाकों में स्कूलों में बच्चों को दोपहर के भोजन योजना की शुरुआत की.
* कोर्ट का हस्तक्षेप
केंद्र सरकार ने भले ही 1995 में इसे लागू किया, लेकिन ज्यादातर राज्यों ने 28 नवंबर, 2001 को सुप्रीम कोर्ट केदिशानिर्देशों के बाद ही इस योजना को अपनाया. इसके बाद से तमाम सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलोंमें यह योजना चलायी जाने लगी. लेकिन 2005 के बाद इस कार्यक्रम को समग्र तौर पर अपनाया गया.
- योजना की खास बातें
वर्ल्ड फूड प्रोग्राम द्वारा प्रस्तुत स्टेट ऑफ स्कूल फीडिंग वर्ल्डवाइड 2013 की रिपोर्ट में इन खासियतों का जिक्रकिया गया है..
भारत में चलायी जा रही मध्याह्न् भोजन की योजना दुनिया की इस किस्म की सबसे बड़ी योजना है. 1911 मेंइस योजना की पहुंच भारत के 11,30,60,000 बच्चों तक थी. भारत में प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चोंकी कुल तादाद के 79 फीसदी को मिड-डे मील मुहैया हो पाता है.
देश में भोजन की सुरक्षा के मामले में अधिकार आधारित नीति अपनायी गयी है, जिसके तहत कानून बना करउसमें कहा गया है देश में स्कूल जाने वाले हर बच्चे का अधिकार है कि उसे स्कूल की ओर से भोजन मुहैयाकराया जाये. इस अधिकार को आहार-सुरक्षा और शिक्षा के अधिकार के व्यापक परिप्रेक्ष्य से जोड़ा गया है.
योजना के लिए सिविल सोसायटी ने आवाज उठायी तो 2001 में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया था कि स्कूल मेंभोजन हासिल करना प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ने वाले हर छात्र का अधिकार है. इस फैसले में कहा गया किप्राथमिक विद्यालयों में सरकार द्वारा बच्चों को पकाया हुआ भोजन दिया जाना अनिवार्य है. इसके परिणामस्वरूपमिड-डे मील योजना के दायरे को बढ़ाया गया है.
कई आंकलनों में कहा गया है कि मध्याह्न् भोजन के कारण स्कूलों में नामांकन पर सकारात्मक असर पड़ा है.इससे बच्चों को भूखे पेट पढ़ाई नहीं करनी पड़ती, जिसे एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर देखा जा रहा है. बतायागया है कि इससे लैंगिक तथा सामाजिक समता की भावना का भी विकास हुआ है.
स्कीम के सुचारु रूप से लागू होने के बाद से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के बच्चों का स्कूल मेंनामांकन बढ़ा है. वर्ष 2001-02 से 2007-08 के बीच के स्कूली नामांकन से संबंधित आंकड़ों के अनुसारअनुसूचित जाति के बच्चों के स्कूली नामांकन में बढ़ोतरी (103.1 से 132.3 फीसदी तक लड़कों के लिए और82.3 से 116.7 तक लड़कियों के लिए) है. अनुसूचित जनजाति के बच्चों के स्कूली नामांकन के मामले में भीखासी बढ़ोतरी (106.9 से 134.4 फीसदी तक लड़कों के लिए और 85.1 से 124 फीसदी तक लड़कियों के लिए)दर्ज की गयी है.
- अब तक का सफर
मिड-डे मील स्कीम के नाम से 15 अगस्त, 1995 को देश के 2,408 ब्लॉकों में केंद्र प्रायोजित योजना के रूप मेंइसे लागू किया गया था. इस योजना में कक्षा एक से 5 तक के सरकारी, परिषदीय, राज्य सरकार द्वारा सहायताप्राप्त प्राथमिक स्कूलों में पढ़नेवाले छात्रों को शामिल किया गया. स्कूल में जिन बच्चों की उपस्थिति 80 फीसदीहै, उन्हें हर महीने 3 किलो गेहूं या चावल देने का प्रावधान किया गया था.
* उपस्थिति बढ़ाने पर रहा जोर
मानव संसाधन मंत्रलय के स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग की वेबसाइट पर इसकी जरूरतों और मकसदों काजिक्र है. बताया गया है कि अधिक से अधिक बच्चों के स्कूल में नामांकन और उनकी नियमित उपस्थिति परमध्याह्न् भोजन का महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है. अधिकतर बच्चे खाली पेट स्कूल पहुंचते हैं. जो बच्चे खाकर भीस्कूल आते हैं, उन्हें भी दोपहर तक भूख लग जाती है और उनका पढ़ाई में मन नहीं लगता.
* पोषण एवं समतामूलक विकास
मध्याह्न् भोजन बच्चों के लिए पूरक पोषण के स्नेत और उनके स्वस्थ विकास के रूप में भी कार्य कर सकता है.यह समतावादी मूल्यों के प्रसार में भी सहायता कर सकता है, क्योंकि कक्षा में विभिन्न सामाजिक पृष्ठभूमि वालेबच्चे साथ में बैठते हैं और साथ-साथ खाना खाते हैं.
मध्याह्न् भोजन स्कूल में बच्चों के मध्य जाति और वर्ग के अवरोध को मिटाने में विशेष रूप से सहायता करसकता है. स्कूल की भागीदारी में लैंगिक अंतराल को भी यह कार्यक्रम कम कर सकता है, क्योंकि यह बालिकाओंको स्कूल जाने से रोकने वाली बाधाओं को दूर करने में सहायता करता है. मिड-डे मिल योजना छात्रों केज्ञानात्मक, भावात्मक और सामाजिक विकास में मदद करती है. सुनियोजित मध्याह्न् भोजन को बच्चों में अनेकतरह की अच्छी आदतें डालने के अवसर के रूप में उपयोग में लाया जा सकता है.
वर्ष 1997-98 तक यह कार्यक्रम देश के सभी ब्लॉकों में आरंभ कर दिया गया. वर्ष 2003 में इसका विस्तार शिक्षागारंटी केंद्रों और वैकल्पिक और नवाचारी शिक्षा केंद्रों में पढ़ने वाले बच्चों तक कर दिया गया. अक्तूबर, 2007 सेदेश के शैक्षणिक रूप से पिछड़े 3479 ब्लॉकों में कक्षा 6 से 8 में पढ़ने वाले बच्चों तक इसका विस्तार कर दियागया. वर्ष 2008-09 से यह कार्यक्रम देश के सभी क्षेत्रों में उच्च प्राथमिक स्तर पर पढ़नेवाले सभी बच्चों के लिएकर दिया गया है. राष्ट्रीय बाल श्रम परियोजना विद्यालयों को भी प्रारंभिक स्तर पर इस योजना के अंतर्गत अप्रैल, 2010 से शामिल किया गया है.
- ये हैं बेहतरीन उदाहरण
तमिलनाडु में प्राइमरी स्कूलों के सभी बच्चों को हेल्थ कार्ड जारी किये गये हैं और प्रत्येक गुरुवार को स्कूलों मेंहेल्थ डे मनाया जाता है. स्कूली परिसर में करी पत्ता और सहिजन के पेड़ लगाये गये हैं. कर्नाटक के सभी स्कूलोंमें रसोई गैस के इस्तेमाल से मिड-डे मील का भोजन तैयार किया जाता है.
पांडिचेरी में प्राइमरी स्कूल के बच्चों को इस योजना के तहत दोपहर का भोजन तो दिया ही जाता है, साथ मेंराजीव गांधी ब्रेकफास्ट योजना के तहत उन्हें बिस्किट के साथ एक ग्लास गर्म दूध भी दिया जाता है. बिहार मेंबाल संसद के माध्यम से यह सुनिश्चित किया गया है कि मिड-डे मील का वितरण सुचारु रूप से हो. उत्तराखंडमें प्राइमरी स्कूलों में महिलाओं को भोजनमाता के रूप में नियुक्त किया गया है. गुजरात, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में बच्चों को भोजन के साथ सूक्ष्म पोषक तत्व मुहैया कराया जा रहा है और उन्हें पेट के कीड़े मारने कीदवा भी दी जाती है.
(स्त्रोत-ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना का दस्तावेज)
(स्त्रोत-ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना का दस्तावेज)
* योजना आयोग द्वारा उठाये गये कदम
योजना आयोग की वेबसाइट के मुताबिक, मिड-डे मिल योजना का मकसद बच्चों का नामांकन बढ़ने और उनकीउपस्थिति सुनिश्चित करना है. साथ ही, यह भी कि बच्चे पढ़ाई बीच में न छोड़ें और उन्हें पौष्टिक भोजन मुहैयाकराया जा सके. 1995 में जारी इस योजना के अंतर्गत 3.22 लाख प्राइमरी स्कूलों के 3.34 करोड़ बच्चों कोपोषाहार देना आरंभ किया गया और यह संख्या 2006-07 में बढ़कर साढ़े 9 लाख स्कूलों के छात्रों तक जा पहुंचीहै.
सितंबर, 2004 में इस योजना में संशोधन करते हुए इसे सर्वव्यापी बनाया गया. सरकारी अनुदान प्राप्त स्कूल,स्थानीय शासन के अंतर्गत चलनेवाली शिक्षा शालाएं और सरकारी प्राइमरी स्कूल में (कक्षा 1 से 4 तक) पढ़नेवाले प्रत्येक छात्र को इसके दायरे में लाया गया. बच्चों को उचित पोषाहार को सुनिश्चित करने के लिए केंद्रीयकोष से प्रत्येक छात्र पर एक रुपये मंजूर हुआ. अपर प्राइमरी स्कूल के बच्चों के लिए सुनिश्चित किया गया है किउन्हें भोजन से 700 किलो कैलोरी हासिल हो. इसके लिए 150 ग्राम अनाज और 20 ग्राम प्रोटीन की मात्र तयकी गयी है.
2006 में फिर से संशोधन किया गया और भोजन पकाने के मद में प्रति छात्र रकम को बढ़ाते हुए 2 रुपये कर दीगयी. कैलोरी की मात्र घटाकर 450 किलो कैलोरी रखी गयी, जबकि प्रोटीन की मात्र घटाकर 12 ग्राम कर दीगयी.
रिपोर्टो के मुताबिक एमडीएमएस से ग्रामीण आबादी के 8.1 फीसदी और शहरी आबादी के 3.2 फीसदी को इसकाफायदा मिला है. इससे निम्न आय वर्ग के परिवार के बच्चों को फायदा पहुंचा है. सरकार की रिपोर्ट में बतायागया है कि 2007 में मिड-डे मिल के लिए बजट में 7,324 करोड़ रुपये का प्रावधान रखा गया था. वर्ष 2013-14में इसे बढ़ाकर 13,215 करोड़ रुपये कर दिया गया है
- दुनिया के किन देशों में है ऐसी योजना
वर्ल्ड फूड प्रोग्राम द्वारा प्रस्तुत स्टेट ऑफ स्कूल फीडिंग वर्ल्डवाइड 2013 की रिपोर्ट के मुताबिक दुनियाभर मेंविभिन्न देशों में ऐसी योजना चलायी जा रही है. दुनिया के विकासशील और विकसित देशों में मौजूदा हालात कोदेखें, तो कुल 36 करोड़ 80 लाख यानी हर पांच में से एक बच्चे को स्कूलों में पोषाहार देने की योजना के मामलेमें बड़ी योजना चलाने वाले देशों के नाम हैं..
- ब्राजील 4 करोड़ 70 लाख
- अमेरिका 4 करोड़ 50 लाख
- चीन 2 करोड़ 60 लाख
43 देश दुनिया में कम से कम ऐसे हैं, जहां स्कूलों में छात्रों को पोषाहार देने की योजना 10 लाख से ज्यादाबच्चों तक पहुंच सकी है.
169 देशों में प्रतिदिन स्कूलों में बच्चों को मध्याह्न भोजन का फायदा मिलता है.
36 करोड़ 80 लाख बच्चे दुनियाभर में हो रहे हैं इस तरह की योजनाओं से लाभान्वित.
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